Skip to main content

यादो की खिड़की


जब यादो की खिड़की को खोला मेने 
एक हसी जोर से आ के चहरे पे लगी थी,
कुछ देर तो सहें सा गया था में , पर जब वो हसी,
बारिश की बूंद बनके गिरी चहरे पर तो देखा मेने के वहा ,
माँ की गुदगुदी और बाबूजी का तेज़ जुला था 
दादी की दिलचस्प कहानिया और दादा का एक ब्लेक एंड वाइट फोटो था,


छोटी छोटी गलियों में बड़ा एक बचपन था
यारो के संग रंगीन हर लमहा था.


पहली सिगारेट जलने की शुर्विरता थी
और उसे दोस्तों को सिखाने के चक्कर में पड़ी चपेट थी 


अनजान शहर में किताबो का एक ढेर था 
और प्रिन्सिपाल के केबिन की ठंडी केबिन के पीछे 
मेरे महबूब के अंचल की गर्मी थी.
 में तो डरा रहता था अपने भूतकाल से 
पर जब मेने यादो की खिड़की को खोला 
तो एक हसी जोर से आके चहरे पे लगी थी 

Creative Commons License
यादो की खिड़की by Ankit Gor is licensed under a Creative Commons Attribution 3.0 Unported License.
Based on a work at ankitisam.blogspot.com.
Permissions beyond the scope of this license may be available at akki.gor77@gmail.com.

Comments

Popular posts from this blog

નનામી

આજે જે કઈ પણ લખી રહ્યો છું એ વાર્તા , કલ્પના કે ફિક્શન નથી બસ લાગણીઓ છે, એના કરતાં પણ સ્પષ્ટ કહું તો માત્ર ગુસ્સો. બે એક દિવસ થી કામમા હતો એટલે ન્યુઝ જોઈ શકતો નોહ્તો માટે આજે સવારે ન્યુઝ જોયા ત્યારે ફરી થી લોકો રસ્તા ઉપર ભેગા થઇ ગયા હતા, વાત એ જ્ હતી પણ કદાચ એ મારા માટે પેહલા કરતાં પણ વધારે ક્રૂર હતી ,  ફરી એ જ્ શહેર. અને આ વખતે વિક્ટમ એક પાંચ વર્ષ ની છોકરી,  સાચું કહું છું રુવાંટા ઉભા થઇ ગયા હતા, પેહલા બે ત્રણ મીનીટ તો ન્યુઝ વાળા બીજુ શું બોલ્યા કઈ જ્ ખબર નથી પણ હા પછી ખબર પડી કે કોઈ ડીબેટ ચાલી રહી હતી , એ જ્ બધું પોલીસ રિપોટ નોહતી લખી રહી. કોઈક એમ એલ એ  એમ પણ કહ્યું કે આ તો પોલીટીક્સ થઇ રહી છે, ગાળ બોલવા ની ઈચ્છા થઇ ગઈ હતી , ઈનફેક્ટ બોલી પણ ગયો હતો, એક બાજુ આવી ઘટના બની ગઈ છે અને બીજી બાજુ એ લોકો  ને પોતાની પોલીટીક્સ સિવાય બીજું કઈ સુજતું નથી . પછી યાદ આવ્યા એ આંકડા જે ગેંગ રેપ્ વખતે સાંભળ્યા હતા , ૨૦૧૨ મા ૨૧૦૦૦ રેપ કેસ  નોધાયા હતા , રાજધાની દિલ્લી મા કઈ ૬૦૦ ઉપર્ કેસ નોધાયા અને એમાં થી માત્ર એક નું જ્ નિરાકરણ આવ્યું છે. અને આ માત્ર નોધાયેલા કેસ છે આ...

मुलाकात

पहेले की तरह बस एक रोज फिर आ जाओ , यादो के कुछ पोधे मुरजा रहे है उन्हें पानी दे के चली जाना. आओ तो सरगोशी में जो गुफ्तगू किया करते थे उन्हें साथ ले आना ,  और किताबो के पीछे रक्खी हुई उन तिरछी नजरो को भी ले आना . तुम भलेही बात तक न करना मुजसे , में भी चुप चाप एक कोने में जाके बेठा रहूँगा . लेकिन तकिये से जरा बतिया लेना ,उसे जुकाम हुआ है . और जिस दीवार से पीठ लगा कर तूम फोन पे बाते किया करती थी उसे मिल लेना , आज कल वो बहोत अकेली पड गई है . रसोईघर की हर एक चीज़ मेरे खिलाफ मोरचा निकाल ने वाली है , उन्हें ज़रा समजाना के में अभी नया हू , सीख जाऊंगा . जुला , लेप्म , तुम्हारी वाली खुर्शी वो सब तो रूठे हुए परिवार वालो जेसे है सामने होते है पर बात कोई नहीं करता . और सर्दियों वाली रजाई निकाल के बस कुछ पल सोजाना. इतने स्पर्श छोड़ जाना के जो इस घर को तुम्हारे यहाँ होने का एहसास कराये. में तो आदत डालने की कोशिश कर रहा हू लेकिन , ये घर मानने को तैयार ही नहीं है, अगर मकान होता तो में समजा भी लेता. इसका मन रखने के खातिर ही सही पहेले की तरह बस एक रोज फिर आ जा...

हम/ मैं / तूं /......

चल तुजे एक खुशखबरी सुनाता हूँ. अब उन सब बातोंमें मत जाना के इतने दिन कहाँ था ? क्या किया? तुजे तो पता है लॉस्ट हो जाना अब मेरा पात्र है. तुजिसे जो सिखा है. पर इस बार में लॉस्ट होने को नहीं गया था. इलाज के लिए गया था. फोन लगाने से पहले एक बार पूरा पढ़ ले. में अभी ठीक हूँ और ये इलाज बहोत इमोशनल लेवल पे है न के फिजिकल, तोह की चिंता मत कर. दरअसल पक चूका हूँ , मर चुका हूँ, और मुझे जीना है. में मानता हूँ के प्यार दुनियाकी सबसे खुबसूरत चीज़/ईमोशन है , लेकिन ये ही सबसे भद्दा भी है. में मानता हु अगर किसी से प्यार करो तो टूट के करो, पूरी शिद्दत से करो लेकिन ये ऊम्मीद मत रखोकी वो भी तुमसे इतना ही प्यार करे. अब ये जो सेकंड पार्ट है उम्मीद वाला वो साला डिफिकल्ट है. इतने साल तो कोई ख़ास दिक्कत नहीं हुई पर अब हो रही है. शायद में इनसिक्योर हो गया हूँ एसा मान सकती हो. पर कोई उम्मीद न रखना पोसिबल नहीं है, कुछ समय के बाद कुछ टूटने लगता है , आईने जेसा, और उस काच के टूकडे अंदर से चुभने लगते. और खून साला आँखों से निकलता है.  में अब इंतजार नहीं कर सकता, इसका मतलब ये नहीं है के कोई जवाब या रिएक्शन चाहता हू...